जैसे कि हम जानते हैं कि इसके साथ ही कई स्थानों पर दही-मटकी प्रतियोगिता का आयोजन भी होता है, जो कि कृष्ण की मटकी फोड़ वाली लीला से प्रेरित है। कृष्णा गोपिकाओं की दही की मटकियां फोड़ते थे।
गोपियों की मटकी
आधुनिक युग में देखा जाए तो श्रीकृष्ण हमारे 'अध्यात्मिक दर्शन' के सबसे बड़े आधार स्तंभ हैं। अगर श्री कृष्ण को केवल मानव स्वरूप में ही जाना जाए तो भी उनका जीवन ऐसे सधे हुए कर्मों का उदाहरण रहा है कि कोई भी व्यक्ति खुद ही भगवान जैसा हो जाए। वास्तव में कृष्ण का पूरा जीवन ही श्रेष्ठ प्रबंधन का सुन्दर उदाहरण है।
बालकाल को ही स्मरण करें तो एक प्रसंग आता है कि वह गोपिकाओ की दूध -दही की मटकी फोड़ दिया करते थे जो कि गोकुल से मथुरा राज्य में कर के रूप में जाती थीं। आज हम इसे एक उत्सव के रूप में मनाते हैं लेकिन उस समय यह एक कर रूप किया जाता था।

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